मेरी माँ मेरे साथ रहती है
घर-आँगन, चार दिवारी के दरमियाँ नहीं
मेरी माँ मेरे मन में रहती है।
अंजान अकेली राहों में मन घबराता है कभी,
साहस बनकर वो मेरे साथ रहती है।
ठोकर खाकर जो मैं गिर जाऊँ जटिल रस्तों में,
मेरे कदमों की ताकत बनकर मेरे साथ रहती है।
अंधेरों में मैं पथ भटक जाऊँ तो,
मेरे मन के विश्वास का दिया बनकर मेरे साथ रहती है।
उलझनों के भवर में मेरी नौका डूबने लगे जब,
दृढ़ निश्चय रूपी मांझी बनकर, मेरे साथ रहती है।
बाधाओं से टकराकर जो मेरे सपने टूट जाएँ,
आशा भरी आँखें उसकी मरहम बनकर मेरे साथ रहती हैं।
जीवन की राह पर जब कदम बढाऊँ मैं,
उसकी सीख मेरे मन की आवाज़ बनकर साथ रहती है।
मेरी हर खुशी में, मेरे हर दुख में
मेरी माँ ही तो है जो हमेशा मेरे साथ रहती है।
(छवि)
A sentimental place where I share thoughts; sometimes rhythmic and sometimes just raw.
Saturday, 7 May 2016
Mother's day special
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